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संवैधानिक रिट: अनुच्छेद 32 और 226 की समझ — उत्तर सहित MCQ

संवैधानिक रिट: अनुच्छेद 32 और 226 की समझ पर अपनी समझ को UPSC प्रीलिम्स-शैली के 10 प्रश्नों से परखें। पहले स्वयं हल करें, फिर सही विकल्प और व्याख्या के लिए “उत्तर देखें” दबाएँ।

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  • 10 अभ्यास प्रश्न
  • ≈ 10 मिनट
  • उत्तर और व्याख्या

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पहले हर प्रश्न स्वयं हल करें, फिर उत्तर जाँचें।

  1. प्र.1 निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. भाग III का उल्लंघन स्थापित न होने पर भी सार्वजनिक विधि संबंधी वैधानिक अधिकार अनुच्छेद 226 के अंतर्गत प्रवर्तनीय हो सकता है। 2. प्रतिवादी सरकारी प्राधिकारी हो तो प्रत्येक वैधानिक शिकायत के लिए अनुच्छेद 32 उपलब्ध हो जाता है। 3. अनुच्छेद 226 का व्यापक विषयगत दायरा न्यायिक पदक्रम को नहीं बदलता। उपर्युक्त कथनों में से कौन-से सही हैं?

    1. A. केवल 1 और 2
    2. B. केवल 2 और 3
    3. C. 1, 2 और 3
    4. D. केवल 1 और 3
    उत्तर देखें

    सही उत्तर: (D) केवल 1 और 3

    व्याख्या

    सही उत्तर: (D)। कथन 1 और 3 सही हैं। अनुच्छेद 226 उपयुक्त मामलों में भाग III से आगे अन्य विधिक प्रयोजनों तक जाता है। अनुच्छेद 32 मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन से जुड़ा है। प्रतिवादी की सरकारी पहचान हर वैधानिक शिकायत को मौलिक अधिकार का दावा नहीं बनाती। प्रावधान का दायरा और न्यायिक पदक्रम अलग हैं।

  2. प्र.2 राज्य X में मुख्यालय वाला प्राधिकारी आदेश जारी करता है, जिसके वाद हेतुक का सारवान भाग राज्य Y में उत्पन्न होता है। अनुच्छेद 226(2) के संदर्भ में कौन-सा निष्कर्ष सर्वाधिक उपयुक्त है?

    1. A. प्राधिकारी वहाँ स्थित होने के कारण केवल राज्य X का उच्च न्यायालय कार्य कर सकता है
    2. B. मुख्यालय बाहर होने पर भी राज्य Y का उच्च न्यायालय कार्य कर सकता है
    3. C. प्राधिकारी कई राज्यों में कार्य करता है, इसलिए कोई भी उच्च न्यायालय कार्य कर सकता है
    4. D. मुख्यालय स्थानांतरित होने पर ही Y के उच्च न्यायालय को अधिकारिता मिलेगी
    उत्तर देखें

    सही उत्तर: (B) मुख्यालय बाहर होने पर भी राज्य Y का उच्च न्यायालय कार्य कर सकता है

    व्याख्या

    सही उत्तर: (B)। अनुच्छेद 226(2) वाद हेतुक पूर्णतः या अंशतः उत्पन्न होने वाले क्षेत्र के उच्च न्यायालय को शक्ति देता है, भले प्राधिकारी बाहर स्थित हो। दिए गए तथ्यों में Y का प्रासंगिक क्षेत्रीय संबंध है। इससे हर उच्च न्यायालय सक्षम नहीं बनता। मुख्यालय बदलना या अनेक राज्यों में कार्य करना निर्णायक कसौटी नहीं है।

  3. प्र.3 निजी नियोक्ता किसी श्रमिक को गैरकानूनी ढंग से बंद रखता है और श्रमिक स्वयं न्यायालय नहीं पहुँच सकता। बंदी प्रत्यक्षीकरण की भूमिका को कौन-सा कथन सर्वाधिक सही बताता है?

    1. A. उपयुक्त व्यक्ति श्रमिक की ओर से निरुद्धि की जाँच की माँग कर सकता है
    2. B. उपचार के लिए बंद करने वाले का सार्वजनिक अधिकारी होना आवश्यक है
    3. C. निरुद्धि की वैधता जाँचने से पहले श्रमिक को स्वयं याचिका देनी होगी
    4. D. न्यायालय को पहले आपराधिक विचारण में श्रमिक का दोष तय करना होगा
    उत्तर देखें

    सही उत्तर: (A) उपयुक्त व्यक्ति श्रमिक की ओर से निरुद्धि की जाँच की माँग कर सकता है

    व्याख्या

    सही उत्तर: (A)। बंदी प्रत्यक्षीकरण निजी व्यक्ति द्वारा किए गए अवैध बंदीकरण पर भी लागू हो सकता है। जो व्यक्ति स्वयं नहीं पहुँच सकता, उसकी ओर से उपयुक्त व्यक्ति न्यायालय जा सकता है। मुद्दा निरुद्धि का विधिक आधार है, पहले आपराधिक दोष तय करना नहीं। प्रतिनिधित्व से बंदीकरण स्वयं उपचार में बाधा नहीं बनता।

  4. प्र.4 कानून प्राधिकारी को अनुज्ञप्ति आवेदनों पर विचार का दायित्व देता है, लेकिन निर्धारित आधारों पर अस्वीकृति भी संभव है। प्राधिकारी वैध आवेदन जाँचने से ही मना करता है। आवेदक की मूल पात्रता पहले से माने बिना कौन-सी राहत परमादेश के सर्वाधिक अनुरूप है?

    1. A. प्रशासनिक मौन से पात्रता सिद्ध मानकर अनुज्ञप्ति देना
    2. B. भविष्य की सभी अनुज्ञप्तियों की शक्ति न्यायालय को सौंपना
    3. C. विधिसम्मत विचार का निर्देश देना और अधिकृत निर्णय प्राधिकारी पर छोड़ना
    4. D. विचार में देरी मात्र के कारण वैधानिक अस्वीकृति आधार निरस्त करना
    उत्तर देखें

    सही उत्तर: (C) विधिसम्मत विचार का निर्देश देना और अधिकृत निर्णय प्राधिकारी पर छोड़ना

    व्याख्या

    सही उत्तर: (C)। यहाँ स्थापित दोष विचार करने के कर्तव्य की अवहेलना है। परमादेश प्राधिकारी से विधिसम्मत शक्ति का प्रयोग करा सकता है। कानून उचित अस्वीकृति की अनुमति देता हो तो अनुकूल परिणाम आवश्यक नहीं है। मौन या विलंब से पात्रता सिद्ध नहीं होती और दिए गए तथ्यों से वैधानिक मानदंड अमान्य नहीं हो जाते।

  5. प्र.5 निजी निकाय से जुड़ी निम्नलिखित स्थितियों पर विचार कीजिए: 1. प्रभावित व्यक्ति के प्रति सार्वजनिक कर्तव्य पूरा न करना। 2. सार्वजनिक कर्तव्य से असंबंधित पूर्णतः निजी संविदात्मक विवाद। किस स्थिति में केवल निजी पहचान होने से अनुच्छेद 226 के अंतर्गत परमादेश बाहर नहीं हो जाता?

    1. A. केवल 2
    2. B. केवल 1
    3. C. समान आधार पर 1 और 2 दोनों
    4. D. न तो 1, न ही 2, क्योंकि निजी स्वामित्व निर्णायक है
    उत्तर देखें

    सही उत्तर: (B) केवल 1

    व्याख्या

    सही उत्तर: (B)। परमादेश का आधार चुनौती दिए गए आचरण से संबंधित सार्वजनिक कर्तव्य है। इसलिए स्थिति 1 में निजी स्वामित्व मात्र बाधा नहीं है। स्थिति 2 में इस उपचार के लिए आवश्यक सार्वजनिक विधि का संबंध नहीं है। संस्था के कुछ सार्वजनिक कार्य उसके प्रत्येक अलग निजी अनुबंध को सार्वजनिक कर्तव्य नहीं बनाते।

  6. प्र.6 निम्नलिखित युग्मों पर विचार कीजिए: 1. प्रतिषेध — अधिकरण की अधिकारिता से बाहर की जारी कार्यवाही रोकना। 2. उत्प्रेषण — मान्य समीक्षा आधारों पर अधिकरण का गैरकानूनी निर्णय निरस्त करना। 3. अधिकार पृच्छा — अनुज्ञप्ति प्राधिकारी से उपेक्षित आवेदन पर निर्णय कराना। कितने युग्म सही सुमेलित हैं?

    1. A. केवल दो
    2. B. केवल एक
    3. C. तीनों
    4. D. कोई नहीं
    उत्तर देखें

    सही उत्तर: (A) केवल दो

    व्याख्या

    सही उत्तर: (A)। पहले दो युग्म निवारक और सुधारात्मक कार्यों का सही अंतर बताते हैं। तीसरा युग्म सार्वजनिक कर्तव्य के प्रवर्तन का है, जो सामान्यतः परमादेश से संबंधित है। अधिकार पृच्छा पद पर बने रहने का विधिक आधार जाँचती है। वह अनुज्ञप्ति आवेदन पर निर्णय न करने का सामान्य उपचार नहीं है।

  7. प्र.7 अधिकरण को अधिकारिता है, उसने निष्पक्ष प्रक्रिया अपनाई है और साक्ष्य-समर्थित तथ्यगत निष्कर्ष दिया है। असंतुष्ट पक्ष केवल दूसरा साक्ष्यगत निष्कर्ष संभव होने के आधार पर उत्प्रेषण माँगता है। इस माँग पर सबसे मजबूत आपत्ति क्या है?

    1. A. उत्प्रेषण केवल अंतिम आदेश से पहले लागू होता है
    2. B. प्राकृतिक न्याय न्यायालय से याचिकाकर्ता का साक्ष्यगत दृष्टिकोण अपनाना चाहता है
    3. C. अधिकरण का प्रत्येक निर्णय संवैधानिक समीक्षा से मुक्त है
    4. D. उत्प्रेषण वैधता की समीक्षा है, साक्ष्य के नए आकलन की सामान्य अपील नहीं
    उत्तर देखें

    सही उत्तर: (D) उत्प्रेषण वैधता की समीक्षा है, साक्ष्य के नए आकलन की सामान्य अपील नहीं

    व्याख्या

    सही उत्तर: (D)। केवल वैकल्पिक तथ्यगत निष्कर्ष संभव होने से उत्प्रेषण का मान्य आधार स्थापित नहीं होता। रिट वैधता नियंत्रित करती है, सामान्य गुण-दोष अपील नहीं बनती। अधिकरण के निर्णय समीक्षा से मुक्त नहीं हैं और उचित आधार पर अंतिम आदेश निरस्त हो सकते हैं। लेकिन यहाँ बताई शिकायत मात्र से ऐसा आधार नहीं बनता।

  8. प्र.8 स्वतंत्र स्वरूप वाले वैधानिक सार्वजनिक पद की नियुक्ति पर दो आपत्तियाँ हैं: 1. नियुक्त व्यक्ति में कानून द्वारा निर्धारित अनिवार्य योग्यता नहीं है। 2. नियुक्ति कानून के अनुरूप है, लेकिन दूसरा उम्मीदवार अधिक उपयुक्त माना जाता है। दिए गए तथ्यों में कौन-सी आपत्ति अधिकार पृच्छा का आधार है?

    1. A. केवल 2
    2. B. 1 और 2 दोनों
    3. C. केवल 1
    4. D. न तो 1, न ही 2
    उत्तर देखें

    सही उत्तर: (C) केवल 1

    व्याख्या

    सही उत्तर: (C)। अधिकार पृच्छा सार्वजनिक पद धारण करने का विधिक अधिकार जाँचती है। अनिवार्य योग्यता का अभाव पात्रता का दोष है, इसलिए पहली आपत्ति उचित आधार है। कानून पूरा होने पर तुलनात्मक उपयुक्तता मात्र अवैध पदधारण नहीं दर्शाती। यह उपचार पात्र उम्मीदवारों के संबंध में नियुक्तिकर्ता के वैध आकलन का सामान्य प्रतिस्थापन नहीं है।

  9. प्र.9 कथन-I: प्रभावी वैधानिक अपील उपलब्ध होना सामान्यतः अनुच्छेद 226 की अधिकारिता के तत्काल प्रयोग के विरुद्ध जाता है। कथन-II: वैकल्पिक उपचार का सिद्धांत न्यायिक विवेक का मार्गदर्शन करता है और निर्दिष्ट गंभीर विधिक दोषों के लिए अपवाद बनाए रखता है। निम्नलिखित में से कौन-सा सही है?

    1. A. दोनों सही हैं और II, I की व्याख्या करता है
    2. B. दोनों सही हैं, लेकिन II, I की व्याख्या नहीं करता
    3. C. I सही है, लेकिन II गलत है
    4. D. I गलत है, लेकिन II सही है
    उत्तर देखें

    सही उत्तर: (A) दोनों सही हैं और II, I की व्याख्या करता है

    व्याख्या

    सही उत्तर: (A)। प्रभावी वैधानिक मार्ग को सामान्य प्राथमिकता अनुच्छेद 226 की शक्ति के प्रयोग में न्यायिक आत्मसंयम से मिलती है। दूसरा कथन इसी प्राथमिकता का कारण बताता है, अधिकारिता समाप्त नहीं करता। प्राकृतिक न्याय का उल्लंघन, मौलिक अधिकार प्रवर्तन, पूर्णतः अनधिकृत कार्यवाही और कानून की वैधता की चुनौती अपवाद हैं, जिनकी तथ्यगत जाँच जरूरी है।

  10. प्र.10 निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. अधिकार पृच्छा की सद्भावपूर्ण चुनौती देने वाले को सार्वजनिक पद पर अपना व्यक्तिगत दावा दिखाना आवश्यक नहीं है। 2. राज्य में निवास मात्र से अनुच्छेद 226(2) की अधिकारिता स्थापित होती है, भले वहाँ प्रासंगिक वाद हेतुक न हो। 3. आवश्यक सुनवाई न देने पर आदेश निरस्त होने से माँगे गए मूल लाभ की पात्रता अनिवार्यतः सिद्ध हो जाती है। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

    1. A. केवल 1 और 2
    2. B. केवल 1
    3. C. केवल 2 और 3
    4. D. 1, 2 और 3
    उत्तर देखें

    सही उत्तर: (B) केवल 1

    व्याख्या

    सही उत्तर: (B)। पहला कथन अधिकार पृच्छा के सार्वजनिक स्वरूप को दर्शाता है। दूसरा कथन अनुच्छेद 226(2) के प्रासंगिक क्षेत्रीय संबंध की जगह निवास को पर्याप्त मानता है। तीसरा प्रक्रियागत अवैधता को मूल पात्रता से मिलाता है। न्यायालय आदेश निरस्त कर विधिसम्मत पुनर्विचार कह सकता है, बिना यह निर्देश दिए कि लाभ अवश्य मिले।

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