पारितंत्र में ऊर्जा का प्रवाह और पोषक तत्त्वों का चक्रण
किसी तालाब में एक समय पर पौधों का जैवभार प्राणियों के जैवभार से कम हो सकता है, फिर भी उसकी खाद्य व्यवस्था पौधों पर निर्भर रहती है। यह विरोधाभास तब दूर होता है, जब हम किसी समय उपलब्ध मात्रा और समय के साथ बनने वाली मात्रा में अंतर करते हैं। जैवभार मापन के समय उपस्थित पदार्थ की मात्रा बताता है, जबकि उत्पादकता नए कार्बनिक पदार्थ के निर्माण की दर बताती है। छोटे, तेजी से प्रजनन करने वाले उत्पादक बार-बार भोजन की पूर्ति कर सकते हैं।
यही अंतर खाद्य शृंखलाओं, पारिस्थितिक पिरामिडों और पारितंत्र के कार्यों को जोड़ता है। संघ लोक सेवा आयोग और राज्य लोक सेवा आयोग की परीक्षाओं के लिए मूल बात यह है कि भोजन के साथ पदार्थ और ऊर्जा, दोनों का स्थानांतरण होता है, लेकिन उनकी आगे की यात्रा समान नहीं होती। पोषक तत्त्वों का पुनः उपयोग संभव है। ऊर्जा धीरे-धीरे ऊष्मा के रूप में बिखरती जाती है, इसलिए पारितंत्र को लगातार ऊर्जा की आपूर्ति चाहिए।
उत्पादक खाद्य आधार तैयार करते हैं
पारितंत्र में जीव और उनके साथ परस्पर क्रिया करने वाला भौतिक पर्यावरण शामिल होता है। पौधे, शैवाल और प्रकाश संश्लेषण करने वाले सूक्ष्मजीव प्रकाश ऊर्जा ग्रहण करके कार्बनिक यौगिक बनाते हैं। इन्हें उत्पादक अथवा स्वपोषी कहा जाता है। प्राणी दूसरे जीवों से कार्बनिक भोजन प्राप्त करते हैं, इसलिए वे उपभोक्ता हैं। अनेक कवक और जीवाणु मृत कार्बनिक पदार्थ को तोड़कर पोषण प्राप्त करते हैं।
पौधों को उत्पादक कहने का अर्थ यह नहीं है कि वे ऊर्जा की सृष्टि करते हैं। प्रकाश संश्लेषण में प्रकाश ऊर्जा का रूपांतरण कार्बनिक अणुओं में संचित रासायनिक ऊर्जा में होता है। बने हुए पदार्थ का कुछ भाग उत्पादक की अपनी उपापचयी क्रियाओं में लगता है। शेष से नया ऊतक बन सकता है अथवा वह भोजन और अपघटन के माध्यम से दूसरे जीवों तक पहुँच सकता है।
अधिकांश परिचित पारितंत्र सूर्य के प्रकाश पर आधारित हैं, परंतु प्रत्येक उत्पादक समुदाय के लिए सूर्य का प्रकाश तात्कालिक ऊर्जा स्रोत नहीं है। गहरे समुद्र के कुछ जलतापीय छिद्रों के आसपास रसायन संश्लेषी सूक्ष्मजीव रासायनिक अभिक्रियाओं से मिली ऊर्जा द्वारा कार्बनिक पदार्थ बनाते हैं। ऊर्जा का स्रोत और उत्पादक की भूमिका अलग बातें हैं। प्रकाश संश्लेषी तथा रसायन संश्लेषी, दोनों प्रकार के स्वपोषी खाद्य जाल को कार्बनिक पदार्थ उपलब्ध कराते हैं।
खाद्य शृंखला और खाद्य जाल
खाद्य शृंखला भोजन संबंधों का एक मार्ग दिखाती है। घास, टिड्डे और कीटभक्षी मेंढक के उदाहरण में घास उत्पादक, टिड्डा प्राथमिक उपभोक्ता और मेंढक द्वितीयक उपभोक्ता है। प्रचलित खाद्य शृंखला आरेख में तीर भोजन बनने वाले जीव से उसे खाने वाले जीव की ओर जाता है। इस प्रकार तीर ऊर्जा स्थानांतरण की दिशा बताता है।
पोषण स्तर भोजन प्राप्त करने की स्थिति है; यह किसी पूरी प्रजाति पर स्थायी रूप से लगा नाम नहीं है। सर्वाहारी जीव एक से अधिक पोषण स्तरों पर भोजन कर सकता है। पौधे का भाग खाने पर वह एक मार्ग में होता है, जबकि शाकाहारी प्राणी खाने पर दूसरे मार्ग में ऊँचे स्तर पर आ जाता है। वास्तविक भोजन संबंध इसलिए अनेक जुड़े हुए मार्गों वाला खाद्य जाल बनाते हैं।
खाद्य जाल एक अकेली शृंखला से अधिक जानकारी देता है, लेकिन वह भी वास्तविकता का सरलीकृत प्रतिरूप है। उसमें मौसम, जीव की आयु और प्रत्येक संबंध से मिलने वाले भोजन की मात्रा छूट सकती है। किसी प्राणी को दूसरे जीव से जोड़ने वाली रेखा केवल भोजन संबंध बताती है। उससे यह निष्कर्ष नहीं निकलता कि उस प्राणी के कुल आहार का कितना भाग उसी भोजन से मिलता है।
चारण और अपरद मार्ग साथ चलते हैं
चारण खाद्य शृंखला की शुरुआत जीवित उत्पादकों को शाकाहारियों द्वारा खाने से होती है। अपरद खाद्य शृंखला मृत कार्बनिक पदार्थ से शुरू होती है। गिरी पत्तियाँ, जीवों के अवशेष और अपशिष्ट इसके उदाहरण हैं। एक ही पारितंत्र में दोनों मार्ग सक्रिय रहते हैं। जो पदार्थ चराई में नहीं खाया जाता, वह बाद में अपरद बन सकता है। अपरद खाने वाले प्राणी भी दूसरे प्राणियों का भोजन बन सकते हैं।
अपरदाहारियों और अपघटकों में अंतर समझना आवश्यक है। केंचुए जैसे अपरदाहारी मृत पदार्थ को निगलते हैं और उसके छोटे टुकड़े करने में सहायता करते हैं। अपघटक सूक्ष्मजीव, विशेष रूप से जीवाणु और कवक, एंजाइमों की सहायता से कार्बनिक यौगिकों का विघटन करते हैं। ये दो अलग पारितंत्र नहीं हैं, बल्कि अपघटन में होने वाली अलग गतिविधियाँ हैं।
अपघटकों को केवल सबसे बड़े परभक्षी के बाद आने वाली अंतिम कड़ी मानना गलत है। उन्हें अनेक पोषण स्तरों से पदार्थ मिलता है। उनकी गतिविधि से मुक्त खनिज पोषक तत्त्वों का उत्पादक पुनः उपयोग कर सकते हैं। दूसरी ओर, कार्बनिक पदार्थ से मिली ऊर्जा अपघटकों के जीवन कार्यों में खर्च होकर अंततः ऊष्मा के रूप में बिखरती है। अपघटन इस ऊष्मा को फिर उपयोगी सूर्यप्रकाश में नहीं बदलता।
सकल और शुद्ध प्राथमिक उत्पादकता
प्राथमिक उत्पादकता उत्पादकों द्वारा कार्बनिक पदार्थ बनाने की दर है। सकल प्राथमिक उत्पादकता (GPP) उत्पादकों के श्वसन व्यय को घटाने से पहले का कुल उत्पादन है। इस व्यय को घटाने के बाद बचा भाग शुद्ध प्राथमिक उत्पादकता (NPP) कहलाता है। समान क्षेत्र और समान अवधि के लिए मापन करने पर संबंध होगा: NPP = GPP − उत्पादकों का श्वसन व्यय।
शुद्ध प्राथमिक उत्पादकता वृद्धि में योगदान देती है और शाकाहारियों तथा अपरद खाद्य जाल को कार्बनिक पदार्थ उपलब्ध कराती है। इसे शाकाहारियों द्वारा वास्तव में खाई गई मात्रा नहीं मानना चाहिए। कुछ ऊतक पौधों में बने रहते हैं, कुछ झड़ जाते हैं और कुछ बिना खाए ही मर जाते हैं। उत्पादन तथा उपभोग को एक मानने से पदार्थ के इन अलग गंतव्यों की अनदेखी होती है।
मापन की इकाइयाँ अंतर स्पष्ट करती हैं। जैवभार को प्रति वर्ग मीटर शुष्क द्रव्यमान के ग्राम में व्यक्त किया जा सकता है। उत्पादकता की इकाई में समय भी आवश्यक है, जैसे प्रति वर्ग मीटर प्रति वर्ष शुष्क द्रव्यमान के ग्राम। ऊर्जा प्रवाह के लिए भी क्षेत्र और समय का समान आधार चाहिए, जैसे प्रति वर्ग मीटर प्रति वर्ष किलोजूल। केवल संख्या देखकर अलग प्रकार के मापों की तुलना करना उचित नहीं है।
ऊँचे पोषण स्तरों तक कम ऊर्जा पहुँचने का कारण
एक पोषण स्तर का पूरा पदार्थ अगले स्तर द्वारा नहीं खाया जाता। खाए गए भोजन का भी पूरा भाग शरीर में स्वांगीकृत नहीं होता। स्वांगीकृत ऊर्जा का बड़ा हिस्सा श्वसन, गति, रखरखाव और अन्य जीवन क्रियाओं में खर्च होता है। केवल कुछ भाग उपभोक्ता के नए जैवभार में बदलता है, जो आगे किसी दूसरे उपभोक्ता का भोजन बन सकता है।
प्रचलित दस प्रतिशत नियम अगले पोषण स्तर तक ऊर्जा स्थानांतरण का उपयोगी सरलीकृत अनुमान है। इसे प्रत्येक प्रजाति और पारितंत्र की बिल्कुल समान दक्षता नहीं समझना चाहिए। वास्तविक स्थानांतरण भोजन की गुणवत्ता, शरीर की क्रियाओं और पर्यावरणीय परिस्थितियों पर निर्भर करता है। इस नियम का अर्थ यह भी नहीं है कि पौधे आने वाले समस्त सूर्यप्रकाश का दस प्रतिशत ग्रहण करते हैं।
अगले चारण स्तर तक न पहुँचने वाली पूरी ऊर्जा तुरंत ऊष्मा में नहीं बदल जाती। बिना खाया पदार्थ और अपशिष्ट अपनी रासायनिक ऊर्जा सहित अपरद मार्ग में जा सकते हैं। फिर भी पूरे तंत्र में उपापचयी उपयोग के कारण ऊर्जा ऊष्मा के रूप में बिखरती है। लगातार स्थानांतरण के बाद ऊँचे उपभोक्ताओं के लिए कम ऊर्जा बचती है। इससे समझ आता है कि खाद्य शृंखला में अनंत पोषण स्तर क्यों नहीं जुड़ सकते।
तीन पारिस्थितिक पिरामिड और उनके अलग माप
| पिरामिड | किसकी तुलना होती है | मुख्य अर्थ |
|---|---|---|
| संख्या | निर्धारित क्षेत्र में प्रत्येक पोषण स्तर के जीवों की संख्या | सीधा या उल्टा हो सकता है; जीव का आकार नहीं बताता |
| जैवभार | प्रत्येक पोषण स्तर पर उपलब्ध जैव द्रव्यमान | उत्पादक जैवभार का तेजी से पुनर्निर्माण होने पर उल्टा हो सकता है |
| ऊर्जा | प्रति इकाई क्षेत्र और समय पोषण स्तरों से गुजरने वाली ऊर्जा | सही ढंग से निर्धारित तुलना में सदैव सीधा रहता है |
एक वृक्ष पर अनेक शाकाहारी कीट निर्भर हो सकते हैं। वृक्ष को केवल एक जीव गिनने से उसके विशाल द्रव्यमान अथवा प्रकाश संश्लेषण करने वाले सतह क्षेत्र की जानकारी नहीं मिलती। संख्या का पिरामिड जीवों की गिनती बताता है। उससे सीधे उपलब्ध ऊर्जा की मात्रा नहीं निकाली जा सकती।
जलीय तंत्र जैवभार का प्रमुख उदाहरण देते हैं। पादपप्लवक तेजी से खाए जाने के कारण किसी समय कम जैवभार में उपस्थित हो सकते हैं। फिर भी उनका तीव्र प्रजनन अधिक जैवभार वाले प्राणिप्लवकों को सहारा दे सकता है। ऐसा उल्टा जैवभार पिरामिड ऊर्जा स्थानांतरण की सीमाओं का उल्लंघन नहीं है। एक समय उपस्थित द्रव्यमान और पूरी अवधि में हुए उत्पादन का मापन अलग-अलग होता है।
ऊर्जा पिरामिड सीधा रहता है, क्योंकि ऊँचे स्तर को पिछले स्तर के उत्पादन का केवल कुछ भाग मिलता है। एक स्तर के दैनिक ऊर्जा प्रवाह की तुलना दूसरे के वार्षिक प्रवाह से करना गलत होगा। बिना समायोजन अलग आकार के क्षेत्रों की तुलना भी सही नहीं होगी। मापन का क्षेत्र, अवधि और सीमा परिणाम की व्याख्या का हिस्सा हैं।
सरल पिरामिडों की सीमाएँ
पारिस्थितिक पिरामिड उपयोगी सार प्रस्तुत करते हैं, लेकिन एक ही ढाँचा पूरे खाद्य जाल को नहीं दिखा सकता। सर्वाहारी जीव कई भोजन स्थितियों में होते हैं और अपघटकों को अनेक स्तरों से पदार्थ मिलता है। मौसमी प्रवास तथा बाहर से आने वाला कार्बनिक पदार्थ भी स्थानीय चित्र को जटिल बना सकते हैं। इन सीमाओं से अवधारणा गलत नहीं होती; इनके कारण मूल मापन को समझना आवश्यक होता है।
उदाहरण के लिए, तालाब में आसपास के वृक्षों की पत्तियाँ गिर सकती हैं। यदि अध्ययन केवल पानी के भीतर उगने वाले पौधों तक सीमित हो, तो अपरद जाल में प्रवेश करने वाली ऊर्जा का एक भाग छूट सकता है। असामान्य परिणाम की व्याख्या करने से पहले अध्ययन में शामिल जीवों, बाहरी निवेश, क्षेत्र और अवधि को स्पष्ट करना चाहिए।
पर्यावरण प्रबंधन में उपयोग
पोषक तत्त्वों की अधिकता बताती है कि उत्पादन बढ़ना हमेशा सुधार नहीं है। उपयुक्त परिस्थितियों में अतिरिक्त नाइट्रोजन या फॉस्फोरस शैवाल की वृद्धि बढ़ा सकते हैं। कार्बनिक पदार्थ के अपघटन के दौरान सूक्ष्मजीवी श्वसन जल में घुली ऑक्सीजन का उपयोग करता है। इसलिए किसी जलाशय में बहुत अधिक शैवाल होने के साथ ही मछलियों के लिए हानिकारक परिस्थितियाँ भी बन सकती हैं।
प्रबंधन के लिए पोषक निवेश, उत्पादन, अपघटन, ऑक्सीजन की उपलब्धता और जीव समुदाय के बदलावों को साथ देखना उपयोगी है। केवल हरा पानी अथवा अधिक जैवभार पारिस्थितिक स्वास्थ्य का पर्याप्त प्रमाण नहीं है। इसी प्रकार किसी दिखाई देने वाले परभक्षी के संरक्षण के साथ उसके शिकार, उत्पादकों और आवास की परिस्थितियों पर भी ध्यान देना आवश्यक है।
ये संबंध सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र तीन के पर्यावरण और संरक्षण विषयों से जुड़ते हैं। खाद्य जाल तथा पिरामिडों के अंतर प्रारंभिक परीक्षा में अवधारणाएँ समझने में सहायक हैं। प्रभावी व्याख्या किसी उपाय को उसके कार्यकारी कारण से जोड़ती है। पोषक तत्त्वों के निवेश को नियंत्रित करना अत्यधिक वृद्धि के कारण को संबोधित करता है, जबकि ऑक्सीजन की निगरानी उसके एक परिणाम को पहचानने में सहायता करती है। एक मापन दूसरे का स्थान नहीं लेता।
त्वरित पुनरावृत्ति
- ऊर्जा भोजन मार्गों से गुजरकर ऊष्मा में बिखरती है; पोषक तत्त्वों का पुनर्चक्रण संभव है।
- खाद्य शृंखला का तीर भोजन से उपभोक्ता की ओर जाता है और सर्वाहारी कई पोषण स्थितियों में हो सकते हैं।
- शुद्ध प्राथमिक उत्पादकता, सकल उत्पादकता में से उत्पादक श्वसन घटाने पर मिलती है। जैवभार उपलब्ध मात्रा है, उत्पादकता दर है।
- अपरद मार्ग को अनेक स्तरों से पदार्थ मिलता है, केवल अंतिम परभक्षी से नहीं।
- संख्या और जैवभार पिरामिड उल्टे हो सकते हैं; सही ढंग से बना ऊर्जा पिरामिड सीधा रहता है।
- दस प्रतिशत नियम सरलीकृत अनुमान है, सभी परिस्थितियों में समान मापी गई दक्षता नहीं।
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